देवों के देव : महादेव
हमारे शास्त्रों में शिवजी को देवाधिदेव कहा गया है। इसका तात्पर्य यह है कि शिवजी समस्त देवों के भी देव हैं और शायद इसलिए उनका एक नाम 'महादेव' भी है।
शिवजी के स्वरूप की सबसे बड़ी विशेषता है- उनका विचित्र और निराला आचरण। पुराणों में शिवजी को एक ऐसे देवता के रूप में वर्णित किया गया है, जो सदा दिगंबर, निर्लिप्त व भूतप्रेतों के साथ विचरण किया करते हैं। अमृत को त्यागकर विष पीने वाले, हाथी-घोड़े छोड़कर बैल की सवारी करने वाले तथा रत्न-आभूषणों को त्यागकर सर्प और नरमुण्डों की माला पहनने वाले शिवजी वास्तव में त्याग की पराकाष्ठा हैं। उनसे बड़ा त्यागी शायद इस चराचर में और कोई दूसरा नहीं है।
शिवजी का चरित्र भी अत्यन्त विलक्षण है जो सदा हमें लोभ, मोह, लालसा के स्थान पर त्याग, अपरिग्रह एवं दूसरों की सहायता करने की प्रेरणा देता रहता है, इसलिए हमारे धर्मग्रंथों में शिवजी का एक विशिष्ट स्थान।