सीएए और एनआरसी पर भ्रम दूर करना आवश्यक
जबसे केन्द्र सरकार सीएए को लेकर आई है, तबसे सम्पूर्ण देश में सियासी ड्रामा चालू हो गया है। जहां सीएए के समर्थन और विरोध में जगह-जगह प्रदर्शन हो रहे हैं, वहीं विपक्षी दल लामबंद होकर इस मामले में सरकार को घेरने का कोई भी मौका चूकना नहीं चाहते हैं। कुल मिलाकर देश का वातावरण काफी तनावपूर्ण होता जा रहा है और आरोप- प्रत्यारोपों के बीच कुछ लोग इसे साम्प्रदायिक रंग देने से भी नहीं कतरा रहे हैं।
यदि निष्पक्ष रूप से देखा जाए तो यह स्थिति एक लोकतांत्रिक देश के लिए किसी चुनौती से कम नहीं लग रही है।
शाहीन बाग में जिस तरह से धरना आन्दोलन चल रहा है, उससे विदेशों में देश की छबि को ठेस पहुंच रही है और देश की धर्मनिरपेक्ष छबि पर हमारे दश्मनों को अंगली उठाने का मौका मिल गया है। आश्चर्य की बात तो यह है कि कुछ तत्वों ने इस पूरे मामले को बड़ी चालाकी से साम्प्रदायिक रंग देकर एक नया बखेड़ा खड़ा कर दिया
दिल्ली के शाहीन बाग के धरने से जो आग भड़की है, वह अब तक कई राज्यों को अपनी गिरफ्त में ले चुकी है और इसे हवा दे रहे हैं विपक्षी दल, वामपंथी बुद्धिजीवी और कम पढ़े-लिखे वे लोग, जिन्हें पता नहीं है कि वास्तव में सीएए, एनआरसी एवं एनपीआर का अभिप्रायः क्या है। दरअसल, देश के मुस्लिम समुदाय को यह कहकर भड़काया जा रहा है कि यह कानून मुस्लिम विरोधी है। अब यह केन्द्र सरकार की जिम्मेदारी है कि वह इस भ्रम को दूर कर देश की जनता को सही वस्तुस्थिति से अवगत कराए।
सरकार को आन्दोलनकारियों से चर्चा कर यह बात स्पष्ट कर देनी चाहिए कि इससे किसी भी नागरिक को जाति, धर्म या नस्ल के आधार पर प्रताड़ित नहीं किया जाएगा और न ही उसे देश की नागरिकता से अकारण बेदखल करने का प्रयास किया जाएगा, लेकिन घुसपैठियों और विदेशियों का अवैध निवास बर्दाश्त भी नहीं किया जाएगा।
ज्ञातव्य है कि यह मामला अब काफी संगीन स्थिति में पहुंच गया है और इस पर बेवजह की राजनीति नहीं होनी चाहिए। साथ ही, विपक्षी दलों को भी अपने तुच्छ स्वार्थ के लिए देश की एकता और अखंडता को दांव पर नहीं लगाना चाहिए।