संपादकीय

नई सोच की दरकार


हम कहां पहुंचना चाहते थे और आज कहां आ गए हैं? यह एक जटिल प्रश्न है, जो आज हर उस युवा के मन में कौंध रहा है, जिसने कभी सुनहरे भविष्य के सपने देखे थे।


भारत युवाओं का देश है। यदि जनसंख्या अनुपात की दृष्टि से देखा जाए तो भारत में 18-35 आयु वर्ग के लोगों की संख्या विश्व में प्रतिशत की दृष्टि से सबसे अधिक है। एक तरफ तो यह गर्व का विषय प्रतीत होता है, लेकिन दूसरी तरफ यह उस अफसोस को भी व्यक्त कर रहा है कि हमारे देश में बेरोजगारों की लंबी फौज खड़ी है, जिसे आज बेहतर रोजगार की दरकार है।


बड़े ही दु:ख के साथ यह कहना पड़ रहा है कि हमारी सोच अभी भी पुरानी रूढ़ियों में जकड़ी हुई है तथा कोई भी नई शुरुआत करना नहीं चाहता। यदि आजादी के बाद के विगत 70 वर्षों के कार्यकाल का विश्लेषण किया जाए तो यह कहा जा सकता है कि हमने सिर्फ पश्चिमी देशों का अंधानुकरण करना सीखा है और आज भी हम उसी राह पर चल रहे हैं। शिक्षा, उद्योग, सामाजिक ढांचा, फैशन एवं सांस्कृतिक परिवेश के क्षेत्र में तो हम पाश्चात्य देशों की नकल करने को ही अपनी शान समझते हैं।


दरअसल, समय के साथ परिवर्तित होना भी लाजमी है, लेकिन हम परिवर्तनों से कतराते हैं। वास्तव में देखा जाए तो परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है और व्यक्ति हो या राष्ट्र, सब को समय के साथ परिवर्तित होना ही पड़ता है। यदि हम मानव जाति का इतिहास उठाकर देखें तो हम यह कह सकते हैं कि जो राष्ट्र या समाज स्वयं को काल व परिस्थितियों के अनुसार ढालने में चूक गए, वे कहीं के न रहे और आज उनका कोई गौरवशाली इतिहास उपलब्ध नहीं है। इसके विपरीत जिन्होंने स्वयं को समय के हिसाब से ढाल लिया, वे आज भी सिर उठाकर अपना नाम रोशन किए हुए।


भारत के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि हम आज भी उन्हीं पुरानी मान्यताओं में उलझे हुए हैं, जिनके कारण अतीत में हमें विदेशी आक्रांताओं की गुलामी सहनी पड़ी थी। दुनियां कहां से कहां पहुंच गई है, लेकिन हम 21वीं सदी में भी जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्रीयता एवं भाषाई संकीर्णता की तकरार से ऊपर उठकर सोच नहीं पा रहे हैं और यही हमारे आगे न बढ़ पाने का मूल कारण है। अतः आज आवश्यकता इस बात की है कि हम सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक मोर्चों पर स्वयं को सक्षम बनाने का प्रयास करें और घिसी-पिटी लीक को छोड़कर अपने आपमें क्रांतिकारी बदलाव लाने का संकल्प लें, तभी हमारा व राष्ट्र का कल्याण संभव हो सकेगा।