कांग्रेस में साथ छोड़ने का सिलसिला है पुराना
ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस छोड़कर भाजपा में जाने का मामला आजकल मीडिया की सुर्खियों में है। सभी अपने-अपने स्तर पर आगामी सियासी धमाकों का कयास लगा रहे हैं। लेकिन यह बात किसी से छिपी हुई नहीं है कि कांग्रेस में पलायन का सिलसिला कोई नया नहीं, वरन् बरसों पुराना है। समय-समय पर कांग्रेस में जहां विभाजन हुए, वहीं अनेक नेता दलबदल कर दूसरे खेमों में जाने या खुद का नया दल बनाने में भी सफल रहे।
अत: ज्योतिरादित्य सिंधिया के जाने से देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी की सेहत पर कोई खास विघटनकारी प्रभाव पड़ता नजर नहीं आ रहा है।
यदि निष्पक्ष रूप से देखा जाए तो यह कहा जा सकता है कि ज्योतिरादित्य जहां राहुल गांधी के सबसे निकटस्थ सहयोगी थे, वहीं गांधी परिवार के भी बेहद विश्वसनीय माने जाते थे, अत: उनके जाने से फर्क तो पड़ेगा पर कांग्रेस समाप्त नहीं होगी। यह वही कांग्रेस है जो नेहरू, शास्त्री, इन्दिरा गांधी एवं अन्य कई महत्वपूर्ण नेताओं के जाने के बाद भी अस्तित्व में बनी रही, तो यह कैसे मान लिया जाए कि सिंधियाजी के जाने मात्र से वह बिखर जाएगी।
पूर्व में शरद पवार, माधवराव सिंधिया, अर्जुनसिंह एवं ममता बनर्जी जैसे अनेक दिग्गजों ने भी नाराजगी के चलते अपने रास्ते बदले थे, पर उसका परिणाम क्या हुआ, सबको मालूम ही है। यहां पर यह जान लेना भी आवश्यक है कि नेता तो आते-जाते रहते हैं, पर संस्थाएं या पार्टियां इतनी जल्दी विघटित नहीं होतीं। कोई भी राजनीतिक दल हो, उसे समय के साथ उतार- चढ़ाव दोनों ही देखने पड़ते हैं।
गौरतलब है कि एक समय केन्द्र सहित अधिकांश प्रदेशों में भी कांग्रेस की सरकार हुआ करती थी, तब विपक्ष ढूंढने से भी नहीं मिलता था, पर आज कांग्रेस उतनी सशक्त नहीं है, लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि भविष्य में उसके वापसी करने के कोई अवसर ही नहीं होंगे